हिन्दीकविता
काँटों से कलम तक
मैं — एक कैक्टस हुँ,
जो उगा है रेत की तपती दोपहरों
में
मेरी जड़ें — दर्द की दरारों
में,
नमी का एक कतरा तलाशती रही हैं
वर्षों से
हर सुबह
ईश्वर के सुर्यवत चरणों में
माथा टेककर प्रार्थना करता हुँ
—
कि अगला जन्म मेरी जन्मभूमि की
मिट्टी में हो,
जहाँ मैं काँटा नहीं,
एक कमल बन सकुँ ।
मैं चाहता हुँ —
कि मेरी हर शूल–सी संवेदना
एक पुष्प बन जाए,
जो न चुभे —
बल्कि किसी हृदय की सजावट बन
जाए
मेरा रोम–रोम
प्रभु के स्पर्श से सुगंधित हो,
और मेरे प्रिय के केशों में
एक वरदान बनकर अटक जाए
मेरी अंतःस्थ वेदना
आँसुओं में ढलकर
ईश्वर की कृपा में रूपांतरित
हो जाए —
और मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व
एक मौन उपहार बन जाए —
उसके चरणों में।
जो मुझे देखे,
वह केवल काँटे न देखे —
बल्कि उस अदृश्य सुगंध को भी
महसुस करे
जो मेरे भितर
प्रभुकी करुणा बनकर बसी हो ।
– रानीगञ्ज, जिल्ला, अररिया, बिहार